International Journal of Humanities and Social Science Research

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International Journal of Humanities and Social Science Research
Vol. 7, Issue 4 (2021)

महिला अधिकार और संघर्षः कल और आज


Dr. Urmil Vats, Dr. Subodh K Singh

आज विश्व के हर कोने में महिला सशक्तिकरण की गूंज सुनाई देती है। 21वीं सदी को महिलाओं की सदी भी कहा जा रहा है। उसके विकास और अधिकारों की बात हर दिशा में हो रही है प्रकृति ने जब नारी व पुरुष दोनों को समान बनाया है। तब क्या वजह है कि आज नारी के अधिकारों की बात अधिक होती है वजह साफ नजर आती है कि प्रकृति ने तो उसे समान बनाया है परन्तु पुरुष प्रधान समाज ने उसे हमेशा समान नहीं समझा। विश्व में ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ महिलाओं को हाशिए पर रखकर आर्थिक विकास संभव हुआ हो। महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़े बिना किसी समाज, राज्य एवं देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पृथ्वी पर जितने भी जीव है सभी को जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। लेकिन इन जीवों में मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जिसे अच्छा जीवन जीने के लिए अधिकारों की आवश्यकता होती है, इनके बिना मनुष्य के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। आदिकाल से लेकर वर्तमान समय तक और भविष्य भी अधिकारों की माँग हमेशा रहती है समय और परिस्थितियों के अनुरूप अधिकारों की माँग में बदलाव आता रहता है। अधिकार क्या है? इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है? अधिकारों का वर्णन तो है, पर क्या देश का हर नागरिक अधिकार प्राप्ति में सक्षम है? क्या उसके पास सम्मानजनक जीने का अधिकार है? अगर नहीं है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है समाज या कानून?
Pages : 31-33