International Journal of Humanities and Social Science Research

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International Journal of Humanities and Social Science Research
Vol. 7, Issue 4 (2021)

देश की अखंडता और दीन दयाल उपाध्याय


सन्नी शुक्ला

भारत में ब्रिटिश राज आने के सौ बर्ष बाद पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जन्म हुआ। बचपन से ही उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष को भली भांति देखा और समझा। उनके बचपन में ब्रिटिश राज के विरूद्ध संघर्ष नया मोड़ ले रहा था। जब उन्होंने अपने जीवन के तीस वर्ष पार किए तब देश स्वतंत्र होने के साथ-साथ विभाजित भी हो चुका था। आधुनिक भारत में कई ऐसे महान पुरूष हैं, जिनको वर्तमान और आने वाली पीढ़ी कभी भी नहीं भुला सकती। स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, वीर सावरकर, महात्मा गांधी, डा. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, भीम राव अम्बेडकर जैसे महान पुरूषों के जीवन को आदर्श मानते हुए हम अपने जीवन का निर्वहन भी कर रहे हैं। भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए कई स्वातंत्रय वीरों ने अपने जीवन की आहुति स्वतंत्रता रूपी यज्ञ में हंसते-हंसते डाल दी। जिस भारत को आजाद करवाने में कई वीरांे ने अपने जीवन का बलिदान दिया, उसी भारत की अखंडता को बनाए रखना और उसे सुखी तथा समृद्ध बनाना सरकारों के साथ-साथ आम समाज का दायित्व भी बनता है। स्वतंत्रता के पश्चात भारत की एकता और अखंडता के लिए जनसंघ द्वारा निरंतर कार्य किया जाता रहा। कश्मीर भारत के लिए अनसुलझी सी पहेली बन चुका था और इस पहेेली को उलझाने वाले कुछ अलगाववादी नेता थे। जिन्होंने हमेशा अपने निजी हितों को आगे रखकर राष्ट्र की एकता और अखंडता के साथ खिलवाड़ किया। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था और हमेशा रहेगा। संास्कृतिक रूप से भी कश्मीर भारत की पहचान है। हमेशा से एक सच्चा भारतीय कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानता रहा है परंतु भारत के ही राजनीतिज्ञांे द्वारा इस तरह का मौहोल बनाया गया कि कश्मीर अपने आप में भारत से अलग होने लगा। इस तरह की व्यवस्थाएं की गई, जिससे कश्मीर में समस्याआंे का जमावड़ा लग गया। दीन दयाल उपाध्याय ने जब राजनीति में प्रवेश किया, उस समय आधुनिक इतिहास में एक राजनीतिक कालखंड समाप्त होकर स्वतंत्रता के बाद का दूसरा कालखंड शुरू हो चुका था। स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद कश्मीर पर कबाईलियांे के साथ मिलकर पाकिस्तान का हमला करना भी बहुत दुर्भाग्यपुर्ण रहा। उस समय राजनीतिज्ञों की गलत नीतियों तथा मूर्खता के कारण पाकिस्तान का कश्मीर के कुछ भाग पर कब्जा हो गया। जो कि वर्तमान समय तक आजाद कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान के कब्जे में बना हुआ है। कश्मीर का अन्य रियासतों की भांति भारत में पूरी तरह से विलय नहीं हो पाया था और दूसरी तरफ शेख अब्दुल्ला ने पंडित नेहरू के साथ जुगलबंदी कर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करवा लिया था। कश्मीर में अनुच्छेद 370 एक काला अध्याय बन कर सामने आई जिसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह था कि यह भारत की अखंडता और एकता के लिए कुठाराघात था। अनुच्छेद 370 की आड़ में ही अलगाववादी नेता अपना विकास तो कर गए पर वहीं कश्मीर का विकास नहीं कर पाए। जनसंघ अपने स्थापना काल से ही कश्मीर में अनुच्छेद 370 का विरोध करते आया है और इसी विरोध के चलते भारत की अखंडता और एकता के लिए इस आंदोलन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान तथा दीन दयाल उपाध्याय का योगदान हमेशा याद रहेगा।
Pages : 34-37