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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 4, ISSUE 3 (2018)
स्थानीय स्वशासन एवं सामूहिक विकास
Authors
मनोज कुमार
Abstract
भारत में पंचायतीराज की अवधारणा बहुत प्राचीन है। यहां प्राचीन संस्थाओं से सम्बन्धित अवधारणा को ही परिवर्तित स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘‘पंचायतीराज’’ शब्द का अस्तित्व स्वतन्त्र भारत में श्री बलवन्तराय गोपाल जी मेहता के ‘‘लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण’ प्रतिवेदन से उदय हुआ, शाब्दिक दृष्टि से पंचायतीराज शब्द हिन्दी भाषा के दो शब्दों ‘‘पंचायत’’ और ‘‘राज’’ से मिलकर बना है जिसका संयुक्त अर्थ होता है पांच जनप्रतिनिधियों का शासन। भारत के प्राचीन साहित्यिक ग्रन्थों में भी पंचायत अथवा ‘‘पंचायती’’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘‘पंचायतन्’’ शब्द से उद्भूत हुआ है। संस्कृत भाषा ग्रन्थों के अनुसार किसी आध्यात्मिक पुरूष सहित पांच पुरूषों के समूह अथवा वर्ग को पंचायतन् के नाम से संबोधित किया जाता था। परन्तु शनैः शनैः पंचायत की इस आध्यात्मिकतायुक्त अवधारणा में परिवर्तन होता गया और वर्तमान में पंचायत की अवधारणा का अभिप्राय इस प्रकार की निर्वाचित सभा से है जिसकी सदस्य संख्या प्रधान सहित पांच होती है और जो स्थानीय स्तर के विवादों को हल कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। गांधी जी ने भी पंचायत शब्द की व्यख्या करते हुए लिखा है कि, ‘‘पंचायत’’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ग्राम निवासियों द्वारा चयनित पांच जनप्रतिनिधियों की सभा से है।
हमारे देश में पंच परमेश्वर यानि की पांच व्यक्तियों द्वारा किया गया कार्य व निर्णय, परमेश्वर की बात के बराबर है, का प्राचीन काल से महत्व रहा है। यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत व्यवस्था संस्कृति की धरोहर के रूप में जानी पहचानी जाती है। स्थानीय लोगों के समूह जिसमें पांच व्यक्तियों द्वारा गांव की समस्याओं का मतभेदों का फैसला करना, प्राचीन पंचायत का मूल कार्य होता था तथा इन व्यक्तियों को पंच परमेश्वर का स्थान दिया गया था। इस प्रकार हम देखें तो गांव के फैसले गांव में ही स्थानीय लोगों के द्वारा किये जाते थे इसमें बाहरी व्यक्तियों या समूहों का हस्तक्षेप नहीं होता था। वास्तव में यह व्यवस्था स्थानीय स्वशासन का एक व्यवहारिक प्रयोग था।
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Pages:12-16
How to cite this article:
मनोज कुमार "स्थानीय स्वशासन एवं सामूहिक विकास". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 4, Issue 3, 2018, Pages 12-16
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