International Journal of Humanities and Social Science Research

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International Journal of Humanities and Social Science Research
International Journal of Humanities and Social Science Research
Vol. 6, Issue 1 (2020)

महात्मा गांधी, खादी एवं चरखा (एक अध्ययन एवं विमर्श)


डा0 दीप्ति जायसवाल

खादी का भारत में बहुत गहरा अर्थ है। यह केवल हाथ से बुना हुआ कपडा नहीं है, बल्कि एक सम्पूर्ण आन्दोलन विचारधारा है। गाँधी जी द्वारा शुरू किये गये खादी आन्दोलन में एक विचारधारा को बढ़ावा दिया, एक विचार यह था कि भारतीय कपास पर आत्मनिर्भर हो सकते है और विदेशी कपडे़ से मुक्त हो सकते है, जिससे भारत में स्वदेशी के प्रयोग के साथ भारतीय अर्थ व्यवस्था में सुधार होगा। महात्मा गाँधी चाहते थे कि खादी राष्ट्रीय कपड़ा बने। महात्मा गाँधी ने 1920 के दशक में ग्रामीण स्वरोजगार एवं आत्मानिर्भरता के क्रम में (ब्रिटेन में मशीन से निर्मित कपड़ों का उपयोग करने के बजाये) खादी के प्रचार एवं प्रसार तथा उपयोग को बढ़ावा देना शुरू किया।
गाँधी जी के अनुसार खादी के सार्वकालीक एवं सार्वभौम पहचान के बिना स्वराज नहीं प्राप्त हो सकता। चरखा एक समय भारत की गरीबी और पिछडेपन का प्रतीत था लेकिन गाँधी ने इसे अहिंसा और आत्मानिर्भरता के चिन्ह् के रूप में प्रस्थापित किया इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता सर्घष में खादी स्वदेशी और स्वराज प्राप्त करने का प्रमुख माध्यम बनी और गाँधी व जनता के मध्य पारस्परिक संबंध व समन्वय स्थापित करने में प्रमुख भूमिका के रूप में दिखाई देती है।
लेकिन आज करीब 150 वर्ष बाद 21वीं0 सदी में खादी अब फैशन स्टेटमेन्ट के रूप में पहचान बना रही है, हालाँकि यह ऐसा बदलाव है जो गाँधी के दृष्टिकोण से काफी अलग है।
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डा0 दीप्ति जायसवाल. महात्मा गांधी, खादी एवं चरखा (एक अध्ययन एवं विमर्श). International Journal of Humanities and Social Science Research, Volume 6, Issue 1, 2020, Pages 52-54
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