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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 8, ISSUE 1 (2022)
योगसूत्र में ईश्वर की अवधारणा
Authors
अजित कुमार
Abstract
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश- ये पाँच क्लेश हैं। पुण्यपुण्य (धर्माधर्म) कर्म हैं। कर्मों के फल को विपाक कहते हैं। उन कर्मों के फलों के अनुरूप बनी हुई वासनायें आशय (संस्कार) हैं। ये सभी मन (बुद्धि) में रहते हुए भी पुरुष (जीवात्मा) में वर्तमान कहे जाते हैं और पुरुष बुद्धि में स्थित उन अविद्यादि से उत्पन्न फलों का भोक्ता कहा जाता है। जैसे- युद्ध में जय या पराजय वस्तुतः राजा के सैनिकों की होती है, परन्तु जय या पराजय का व्यवहार राजा में होता है अर्थात् राजा की कही जाती है। जो सदा ही इन क्लेशकर्मादि तथा इनके भोग से अछूता है, वही पुरुष विशेष ईश्वर है। यद्यपि कैवल्य (मुक्ति) को प्राप्त करने वाले बहुत से केवली होते हैं, उन्होंने तीन बन्धनों (प्राकृतिक, वैकारिक तथा दक्षिणा) को काटकर कैवल्य प्राप्त किया, परन्तु ईश्वर का इन बन्धनों से न कभी सम्बन्ध था और न कभी होगा। जैसे- मुक्त हुए पुरुष की मुक्ति से पूर्वकाल में बन्धन की स्थिति रहती है, ऐसी बन्धन की स्थिति ईश्वर की नहीं होती। अथवा जैसे प्रकृतिलय योगियों की समाधि भंग होने के कारण बाद में शरीरादि के बन्धन की स्थिति सम्भव है, वैसी ईश्वर की नहीं। वह तो सदैव मुक्त है और सदा ही सर्वातिशायी ऐश्वर्यवाला है।
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Pages:75-79
How to cite this article:
अजित कुमार "योगसूत्र में ईश्वर की अवधारणा ". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 8, Issue 1, 2022, Pages 75-79
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