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VOL. 7, ISSUE 6 (2021)
आपराधिक न्याय व्यवस्था में महिला की स्थिति
Authors
उर्मिला राठी
Abstract
आज 21वीं शताब्दी में महिला एवं न्याय के बीच एक दूरी सी दिखाई देने लगी है। एक तरफ महिला स्वयं के प्रयासों से सशक्त, मजबूत होती जा रही है, वही दूसरी तरफ महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, यौन अपराध, अत्याचार बढ़ते जा रहे है, जिसके लिए वह न्यायालय का दरवाजा खटखटाती है परन्तु न्यायालय की लम्बी प्रक्रिया के कारण समय पर न्याय प्राप्त नहीं कर पाती। जिस कारण कहीं बार महिलाओं का अपना जीवन त्यागना अर्थात् आत्महत्यां करनी पड़ती है तो कई बार उसे कानून अपने हाथ में लेना पड़ता है। जबकि महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए आज के समय निम्नलिखित कानून बने हुए हैः- राष्ट्रिय महिला आयोग अधिनियम, 2005, सती प्रथा निवारण अधिनियम एवं नियमावली, दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961, घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005, मातृत्व लाभ अधिनियम, गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971, अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956, बलात्कार से संबंधित विधि में (संशोधन) अधिनियम 2013, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012, कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, महिलाओं का अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986, प्रसूति प्रसूविधा अधिनियम, 1961, भारतीय दण्ड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973, पूर्व गर्भाधान और प्रसव पर्वू निदान तकनीक अधिनियम, 1994।
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Pages:45-49
How to cite this article:
उर्मिला राठी "आपराधिक न्याय व्यवस्था में महिला की स्थिति ". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 7, Issue 6, 2021, Pages 45-49
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