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VOL. 8, ISSUE 1 (2022)
सामाजिक न्याय के बदलते आयाम
Authors
Urmil Vats
Abstract
किसी भी सभ्यता की पहचान उसमें मौजूद शासन प्रणाली के तौर-तरीके व वहाँ के लोगों के बीच सौहार्द भावना से आंकी जाती है। समाज से ही परिवार, कबीला, राष्ट्र, राष्ट्र राज्यों का निर्माण हुआ है। समाज के अन्दर न्याय की आवाज तभी उठती है जब वहाँ रहने वाले लोग किसी न किसी रूप में पीड़ित महसूस करते है। सामाजिक न्याय की माँग समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। अगर विचारधारा के रूप में हम सामाजिक न्याय का अर्थ समझें तो यह समाज के विभिन्न क्षेत्रों में चाहे सामाजिक हो, आर्थिक हो, सांस्कृतिक हो, या राजनैतिक हो, हर प्रकार के उत्पीड़न का विरोध करता है व न्याय की अवधारणा को धरातल पर उतराने की पुरजोर कोशिश करता है। इसके लिए कानून बनाने की माँग से लेकर अन्य संगठनों की स्थापना भी करता है। विभिन्न काल में समय और परिस्थितियों के अनुसार चिन्तकों ने इसे अपने चिन्तन का विषय भी बनाया और अपने विचारों से न्याय की व्याख्या भी की। अब प्रश्न ये है कि जब “न्याय व्यवस्था“ चिन्तन का मुख्य केन्द्र रही है और देश आजाद होने के बाद से विधान में भी विभिन्न प्रावधान किए गए हैं। फिर क्यूं अभी भी न्याय की आवाज उठती है? क्यूं एक वर्ग दूसरे वर्ग से शोषित महसूस करता है। क्या कारण है कि 21वीं सदी में अभी भी जाति, रंग-भेद, वर्ग, लिंग, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक हर क्षेत्र में असमानता नजर आती है? सामाजिक न्याय की प्राचीन व नवीन धारणाओं में अन्तर अभी भी काफी है। इसे कैसे समाप्त किया जाए? इसके लिए कौन से कारक जिम्मेदार है? कानूनी समझ के साथ-साथ मानसिक परिवर्तन कैसे किया जाए? इन सभी पर चिन्तन आवश्यक है।
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Pages:110-112
How to cite this article:
Urmil Vats "सामाजिक न्याय के बदलते आयाम ". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 8, Issue 1, 2022, Pages 110-112
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