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VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
छत्तीसगढ़ में समावेशी विकास: एक अध्ययन
Authors
डॉ. बलभद्र प्रसाद देवांगन
Abstract
समावेशी विकास की अवधारणा विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन में मंथन का विषय रहा है। समावेशी विकास केवल राष्ट्रिय आय में वृद्धि, गरीबी में कमी तथा रोजगार में वृद्धि से ही संबंधित नहीं है, अपितु समाज के प्रत्येक व्यक्ति, महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चो अर्थात हर नागरिक के विकास को ध्यान में रखकर बनाई गई सर्वाेन्मुखी विकास नीति से सम्बंधित है। हालांकि 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना में समावेशी विकास पर बल देते हुए कुछ सहायक योजनाओ का क्रियान्वयन भी किया गया है, फिर भी छत्तीसगढ़ में समावेशी विकास की दिशा में समस्याये, रूकावटे और चुनौतियाँ भी है। वर्तमान लेख में इन्ही चुनौतियों की जाँच का प्रयास किया गया है। प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण एवं जनजातीय विविधताओ को समेटे हुए छत्तीसगढ़ के गठन को 22 वर्ष पूर्ण हो चुके है, अभी भी यदि जनसंख्या की बसाहट को देखे तो छत्तीसगढ़ गाँवो में ही बसता है और स्थानीय लोगो पर ग्रामीण परिवेश एवं समाज का व्यापक असर देखा जा सकता है। यदि समावेशी विकास की बात करे तो सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओ यथा किसान न्याय योजना, गोधन योजना, नरवा गरुवा घुरवा और बारी योजना के द्वारा ग्रामीण आर्थिक स्थिति को बेहतर करने का प्रयास किया गया है किन्तु शहरी क्षेत्र अधिक तेजी से विकास को बढाने वाले क्षेत्र हो सकते है। समावेशी विकास की प्रक्रिया में शहरो के विकास की धीमी गति, उच्चस्तरीय शिक्षण संस्थाओ और व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थाओ का सर्वथा अभाव, वैज्ञानिक अनुसन्धान एवं औद्योगिक विकास की कमी राज्य के समावेशी विकास में रूकावट है।
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Pages:153-155
How to cite this article:
डॉ. बलभद्र प्रसाद देवांगन "छत्तीसगढ़ में समावेशी विकास: एक अध्ययन". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 153-155
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