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VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
भारत में निर्वाचन का स्वरूप एवं निर्वाचन आयोग
Authors
प्रेमसिंह रावलोत, कुसुमलता पुरोहित
Abstract
लोकतंत्र व्यवस्था के अन्तर्गत जनता समय-समय पर अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करती है और प्रतिनिधि विधानसभाओं में जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते है। आजकल संसार में प्रायः सभी लोकतंत्रात्मक राज्यों में परोक्ष अथवा प्रतिनिधि लोकतंत्र की व्यवस्था है। निर्वाचन लोकतंत्र का आधार है और जनता की इच्छा जानने का प्रत्यक्ष तरीका है इसके माध्यम से नागरिक को शासन से जोड़ने की कड़ी मिल जाती है तथा इसमें नागरिक ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया के आधार बन जाते है इसलिए लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए निर्वाचन का निष्पक्ष एवं स्वतंत्र होना आवश्यक हो जाता है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में मतदाता ही सरकार का निर्माणकर्ता होता है। सरकार मतदाताओं की सहमति से ही प्रतिनिधित्व करती है इस राष्ट्रीय सहमति का निष्कपट एवं निष्पक्ष आकलन करना निर्वाचन तंत्र का मुख्य दायित्व होता है। वस्तुतः एक निष्पक्ष सरकार के संदर्भ में वास्तविक प्रमाण निर्वाचन तंत्र का अभिलेख ही होता है। कोई भी अन्य तंत्र स्पष्ट रूप से यह नहीं बता सकता कि सरकार का निर्वाचन निष्पक्ष तरीके से हुआ या नहीं।इस बात का निर्धारण वास्तव में निर्वाचनतंत्र द्वारा ही विशुद्ध रूप से किया जाता है। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र का पर्व है। भारत में चुनाव करवाने का विराट कार्य चुनाव आयोग सम्पन्न करता है। भारतीय संविधान निर्माताओं ने इसके महत्व को देखते हुए चुनाव आयोग को संवैधानिक आयोग का दर्जा दिया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव व्यवस्था के अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण का कार्य भारत में संवैधानिक मान्यता प्राप्त स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव आयोग को सौंपा गया है।
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Pages:123-126
How to cite this article:
प्रेमसिंह रावलोत, कुसुमलता पुरोहित "भारत में निर्वाचन का स्वरूप एवं निर्वाचन आयोग". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 123-126
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