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VOL. 8, ISSUE 3 (2022)
लौकिक मूर्ति कला का ऐतिहासिक अध्ययन
Authors
भाग्यश्री लोदेतिया, धीरेन्द्र सोलंकी
Abstract
प्राचीन भारत में लौकिक मूर्तिकला शब्द का प्रयोग वैदिक युग से ही होता चला आ रहा है। ऋग्वेद में यज्ञ के सम्बन्ध में लौकिक मूर्ति शब्द का प्रयोग मिलता है।1 लौकिक मूर्ति के लिए अर्च्चा शब्द का भी प्रयोग ऋग्वेद किया गया है।2 महर्षि पतंजलि ने भी लौकिक मूर्ति के लिए अर्च्चा शब्द का प्रयोग करते है।3 लौकिक मूर्ति का प्रयोग वस्तुतः उन्हीं मूर्तियों के लिए किया गया है, जो किसी न किसी धर्म अथवा दर्षन से सम्बन्ध रखती है। इन मूर्तियों को और लौकिक मूर्ति में जो मौलिक अंतर पाया जाता है। वह मूर्ति सामान्य दुनियावी मनुष्यों या प्राणियों की आकृतियों के समान होती हुई पाई जाती है। यहाँ तक लौकिक मूर्ति शब्द का प्रयोग देवताओं, देवियों महात्माओं या स्वर्गवासी पूर्वजों के लिए भी प्रयोग किया गया है। इन आकृतियों के लिए विशेष रूप से लौकिक मूर्ति कला का समन्वय स्थापित किया गया है। मूर्ति-निर्माण और लौकिक मूर्ति-निर्माण की प्रक्रिया से कलाकार की षिल्पगत अभिव्यक्ति को दो रूपों में विभाजित किया गया है। यहाँ तक लौकिक मूर्ति-निर्माण के लिए निष्चित नियमों और लक्षणों का विधान माना जाता है। इसके फलस्वरूप कलाकार लौकिक मूर्ति निर्माण के पूर्व स्वतंत्र नहीं होता है। यहाँ तक उसके आन्तरिक कला-बोध की अभिव्यक्तिकरण भी उसमें पूर्ण-रूपेण सम्भव नहीं होती है। इसके विपरीत मूर्ति-निर्माण में कलाकार स्वतंत्र कलाकृतियों को निर्मित करता है। यहाँ तक उसकी समस्त षिल्पगत दक्षता उसके गुणों में दिखाई देती है। इन मूर्तियों का सम्बन्ध मूलभूत धार्मिक परम्पराओं पर आधारित होती है। इसका मूल कारण मुख्य रूप से लौकिक मूर्ति का स्वरूप प्रतीकात्मक भी हो सकता है, किन्तु मूर्ति का एक निष्चित आकार और प्रकार का होना असंभव होता है। उदाहरण के रूप में रेलवे लाइन के किनारे खडे़ हुए पेड़ को पाषाण-खण्ड को मूर्ति की संज्ञा देना सम्भव नहीं होता है किन्तु मन्दिर में रख देने पर उसे लौकिक मूर्ति या (षिवलिंग) की संज्ञा देना आवश्यक हो जाता है।
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Pages:127-128
How to cite this article:
भाग्यश्री लोदेतिया, धीरेन्द्र सोलंकी "लौकिक मूर्ति कला का ऐतिहासिक अध्ययन". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 8, Issue 3, 2022, Pages 127-128
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