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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 8, ISSUE 4 (2022)
नवजागरण आन्दोलन में कुमाऊँनी लोक साहित्य की भूमिका
Authors
दीपा लोहनी, डॉ. नीरज रूवाली
Abstract
नवजागरण आन्दोलन भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस घटना ने भारतीय समाज में एक नवीन विचारधारा को जन्म दिया। इस आन्दोलन की शुरूआत 19वीं सदी के आरंभिक दौर से मानी जाती है। यह वह समय था, जब भारत पर औपनिवेशिक सत्ता स्थापित हो चुकी थी। पाश्चात्य शिक्षा तथा ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया जा रहा था। ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार ने सनातन धर्म में घर कर चुकी कुरीतियों एवं अंधविश्वासों के विरूद्ध आवाज बुलंद करने का अवसर प्रदान किया। लोग समानता एवं सामाजिक-आर्थिक उन्नयन के अवसर की चाह में धर्म परिवर्तन को मजबूर हुए। कुमाऊँ, जो भारत का एक महत्वपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र है, भी इस घटना से अछूता नहीं रहा। कुमाऊँ के ऐतिहासिक अध्ययन से ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र का अतीत सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यन्त गौरवशाली रहा है। यहां की धर्मस्थली एवं तपस्थली इसे देवभूमि बनाती है। आरंभिक समाज में यहां जातिगत भिन्नता के भी प्रमाण नहीं मिलते हैं। अनेक इतिहासकारों का मानना है कि इस क्षेत्र में जातिगत भेदभाव बाहर से आये ब्राह्मण एवं क्षत्रियों की देन है। लेकिन 19वीं सदी के आरंभिक दशक तक यहां की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था भी अन्य क्षेत्रों के समान ही शोषण एवं उत्पीड़न, छुआछूत, अंधविश्वास एवं रूढ़िवादी विचारों का गढ़ बन चुका था। 19वीं सदी के आरंभिक काल में जब यह भू भाग अंग्रेजों के अधीन हो गया तब यहां ईसाई धर्म के प्रचारकों एवं पाश्चात्य शिक्षा तथा संस्कृति के प्रसार को भी बल मिला। इससे सांस्कृतिक संक्रमण की स्थिति उत्पन्न हुई। जो समाज वर्षों से दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, ने धर्म परिवर्तन की राह पकड़ी। समाज में आए इस प्रकार के परिवर्तन ने सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन का बीजारोपण किया। इस आन्दोलन को गति प्रदान करने तथा समाज में समानता कायम करने के लिए बुद्धिजीवी वर्ग ने अलग-अलग तरीके अपनाये। इनमें लोक साहित्य का भी अपना विशेष महत्व रहा है। लोक साहित्य लोक-जीवन एवं लोक-जन से जुड़ा साहित्य है। इसका अतीत मौखिक रहा है, लेकिन बाद के वर्षों में इसे साहित्यिक रूप में संकलित किया जाने लगा। आज जबकि समाज अनेक सामाजिक एवं सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, इसके प्रति सामान्य जन को जागरूक करना तथा समाधान में उनकी सहभागिता सुनिश्चित कराना अत्यन्त महत्वपूर्ण हो गया है। इस दिशा में लोक साहित्य भी एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में प्रयोग में लाया जा सके, इसलिए पूर्व में इनकी सामाजिक जागरूकता में इसकी महत्ता को जानना अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है। इन्हीं कारणों से प्रस्तुत शोधपत्र हेतु शोध शीर्षक ‘नवजागरण आन्दोलन में कुमाऊँनी लोक साहित्य की भूमिका’ का चयन किया गया है।
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Pages:155-158
How to cite this article:
दीपा लोहनी, डॉ. नीरज रूवाली "नवजागरण आन्दोलन में कुमाऊँनी लोक साहित्य की भूमिका". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 8, Issue 4, 2022, Pages 155-158
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