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VOL. 9, ISSUE 1 (2023)
औपनिवेशिक पश्चिमी बिहार में भूमि, जाति और समुदाय की ऐतिहासिकता
Authors
कन्हैया कुमार यादव
Abstract
यह आलेख उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में औपनिवेशिक पश्चिमी बिहार खासकर सारण जिले से संबंधित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक बदलावों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने का एक प्रयास है। इस लेख में औपनिवेशिक दौर की आधिकारिक रिपोर्टों, दस्तावेजों, माइग्रेशन व सेटलमेंट रिपोर्टों, अखबार एवं पत्र-पत्रिकाओं के अलावा भिखारी ठाकुर के नाटकों को प्राथमिक स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया गया है। इन स्रोतों से मिले आकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम तथा बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों के दौरान बिहार के सारण जिला में निम्न जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति काफी दयनीय थी। खेती योग्य भूमि पर ऊँची जातियों का नियंत्रण था। अधिकांशतः लोग भूमिहीन थे। रोजगार सृजन नगण्य के बराबर था। इन परिस्थितियों में लोगों के पास पलायन के बजाय कोई दूसरा विकल्प नहीं था। यही कारण था कि इस दौरान हम देखते हैं कि सारण संपूर्ण बंगाल प्रांत में सबसे ज्यादा पलायन करने वाले जिलों में सुमार था। अंततोगत्वा, अलगाव का दर्द भोजपुरी समाज के लोकगीतों के प्रमुख विशेषता बन गई, जो इस दौरान के भोजपुरी लोकगीतों में साफ दृष्टिगोचर होता है। इसी परिवेश में बिदेशिया जैसी साहित्यिक विरासत का जन्म होता है।
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Pages:70-76
How to cite this article:
कन्हैया कुमार यादव "औपनिवेशिक पश्चिमी बिहार में भूमि, जाति और समुदाय की ऐतिहासिकता". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 9, Issue 1, 2023, Pages 70-76
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