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VOL. 9, ISSUE 3 (2023)
भारत में नगरीय समस्याओं का एक आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन
Authors
तेजप्रकाश
Abstract
मानव सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणों में नगर सभ्यता और संस्कृति के प्रमुख केन्द्र रहे हैं। अंत नगरीकरण या नगरीय विकास के प्रायः सुख समृद्धि तथा सामाजिक-आर्थिक विकास का सूचक माना जाता है। नगर विविध प्रकार के व्यवसायों (उद्योग, व्यापार, परिवहन एवं संचार सेवाएं आदि), स्वास्थ्य सेवाओं, मनोरंजन, उच्च जीवन स्तर आदि का भी केन्द्र होता है जिसके कारण वह अपने आस-पास ही नहीं बल्कि दूरवर्ती क्षेत्रों से भी मनुष्यों को अपनी ओर आकृष्ट करता है। भारत सहित अन्य विकासशील देशों में भी नगरीय जनसंख्या के अनुपात में नागरिक सुविधाओं (भोजन, जल, आवास, सफाई, परिवहन) में बढ़ोतरी नहीं हो पायी है जिसके कारण नगरवासियों के सामान्य जीवन स्तर में गिरावट की प्रवृत्ति पायी गई है। नगर में भीड़-भाड़, गंदगी, बीमारी, बेरोजगारी तथा अनेक प्रकार की सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती है जो नगरीय जीवन की श्रेष्ठता को सुरक्षित रखने में बाधक होती है। नगरीय समस्याओं का मूल कारण नगरों में आवश्यकता से अधिक जनसंख्या का संकेन्द्रण तथा नगर के अनियोजित विस्तार एंव विकास को माना जाता है। वास्तव में नगर में जनसंख्या का केन्द्रीकरण इतनी शीघ्रता और अनियंत्रित ढंग से होता है कि वहंा अपेक्षित नागरिक सुविधाओं का विकास नहीं हो पाता है। जिसके कारण अनेक प्रकार की समस्याएँ जन्म लेती हैं।
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Pages:11-12
How to cite this article:
तेजप्रकाश "भारत में नगरीय समस्याओं का एक आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 9, Issue 3, 2023, Pages 11-12
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