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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
भारतीय चिंतन में मानववाद की अवधारणा
Authors
डॉ. विवेक कुमार राय, प्रद्युम्न पाण्डेय
Abstract
प्राचीन ग्रीक या भारतीय दर्शन से लेकर वर्तमान चिंतन तक में मानववाद के तत्व कम या अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। भारतीय चिंतन में मानववाद की जड़े वेदों तक फैली हुई हैं। भारतीय चिंतन परम्परा में मानववाद को समझने के लिए इसे चार चरणों में विभाजित करके इसका अध्ययन किया जा सकता है। पहले चरण में वैदिक या उपनिषदीय मानववाद आता है। भारतीय मानववादी चिंतन का सबसे महत्वपूर्ण आधार वैदिक मानववाद ही है। इसी के तत्व कम या अधिक मात्रा में अन्य विचारकों में पाए जाते हैं। दूसरे चरण का मानववाद बौद्ध मानववाद है। इसे ईष्वररहित मानववाद भी कहते हैं। क्योंकि इसमें ईष्वर, आत्मा जैसे मुद्दों को अस्वीकार कर दिया गया है। तीसरा चरण चार्वाक या लोकायत मानववाद का है। यह भारतीय चिंतन परंपरा में इकलौता दर्शन है जो कि सम्पूर्ण भौतिकवाद पर आधारित है। इसे भौतिकवादी मानववाद भी कह सकते हैं। यह भी बौद्ध दर्शन की तरह ईष्वर और आत्मा के अस्तित्व में विष्वास नही करता। लेकिन बौद्ध दर्शन और इसमें मुख्य अंतर यह है कि बौद्ध दर्शन में नैतिकता पर जोर दिया गया है जबकि चार्वाक दर्शन नैतिकता को भी नकारता है। भारतीय मानववाद का चौथा चरण 19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण काल के दौरान व उसके बाद का मानववादी चिंतन है। इसमें मुख्य रूप से राजा राममोहन राय, ईष्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, बाल गंगाधर तिलक, स्वामी विवेकानंद के विचार महत्वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त एम एन रॉय का नव-मानववाद एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद भी बहुत महत्वपूर्ण है।
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Pages:29-33
How to cite this article:
डॉ. विवेक कुमार राय, प्रद्युम्न पाण्डेय "भारतीय चिंतन में मानववाद की अवधारणा". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 29-33
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