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VOL. 9, ISSUE 6 (2023)
उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति तथा सुधार कार्य
Authors
रविना
Abstract
प्राचीन काल में भारत में महिलाओं की दशा बहुत उच्चकोटि की थी। उन्हें अपने व्यक्तित्व के निर्माण, शिक्षा, विवाह, सम्पत्ति सभी में पुरूषों के समान स्थान प्राप्त था। महिलाओं को सब प्रकार की समृद्धि का लक्ष्य माना जाता था। कालांतर में उनकी अवस्था अवनत होती गई। उत्तर वैदिक काल तथा स्मृति युग में उनकी अवस्था पतनोमुख हो गई थी, मध्यकाल तक आते-आते इनकी दुर्दशा हो गई थी। उनकी स्वतंत्रता नष्ट हो गई थी। पर्दा प्रथा, बालविवाह, कन्या वध, देवदासी प्रथा, सती प्रथा जैसी घृणास्पअ तथा कुप्रथाएं जीवन का अंग बन गई थी। विधवा पुनर्विवाह होने बंद हो गए थे। बंगाल में कुलीनों में बहुविवाह प्रचलित थे। महात्मा गांधी ने महिलाओं की इस दुर्दशा को समाज के ढांचे में ‘अधरंग’ जैसी बतलाई है। विश्व के संदर्भ में भी महिलाओं की दशा अच्छी न थी। मध्यकाल तथा आधुनिक काल में उनकी अवस्था भी पतनोन्मुख थी। भारतीय समाज में चारों ओर गहरा अंधकार छाया हुआ था। इस अंधकार का प्रमुख कारण भारतीय समाज में प्रचलित अनेक प्रकार की सामाजिक तथा धार्मिक कुप्रथाएं थी। इन प्रथाओं के चलते भारतीय समाज तीव्रता से पतन की ओर अग्रसर हो रहा था तथा प्रकाश की कहीं कोई किरण दिखाई नहीं पड़ रही थी। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में महिलाओं की दशा सुधारने के लिए कुछ प्रयास हुए, इसमें अनेक महान सुधारकों तथा विभिन्न सुधार आन्दोलनों की मुख्य भूमिका रही। कुछ मात्रा में इन कुप्रथाओं को रोकने के लिए ब्रिटिश शासन का भी सहयोग रहा।
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Pages:16-17
How to cite this article:
रविना "उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति तथा सुधार कार्य". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 9, Issue 6, 2023, Pages 16-17
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