Logo
International Journal of
Humanities and Social Science Research
ARCHIVES
VOL. 11, ISSUE 1 (2025)
धरना परम्परा के सिरमोर के रूप में आऊवा
Authors
महेन्द्र सिंह
Abstract
आऊवा का धरना विष्व इतिहास की वह ऐतिहासिक घटना है जिसने लोक के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। चारणों की दृष्टि में धरना कोई सामान्य कर्म नहीं था। इस परम्परा को निरन्तरता देने के लिए चारणों ने काव्य रचे। इन काव्यों से लोगों में वीरता एवं उत्साह का ऐसा संचरण हुआ कि देश एवं देश का इतिहास गौरवान्वित हो गया। लोगों ने अन्याय एवं अत्याचार का न केवल सामना किया अपितु उन अत्याचारियों को धरने के बल धूल भी चटाई। इसके लिए शक्ति की आराधना का काव्य भी रचा गया। इसी काव्य ने लोगों को मृत्यु भय से मुक्त किया। यही इस काव्य की सार्थकता है। इसीलिए चारणों ने धरनास्थल पर मृत्यु के वरण को श्रेष्ठ कर्म माना। ऐसे मरण को उत्सव व अनुष्ठान का रूप दिया। इसी दर्शन के बल पर पीड़ित, दलित तथा निरुपाय समाज भयमुक्त होकर धरनास्थल पर जूझने की आकांक्षा लेकर बड़ी से बड़ी राजशक्ति से लोहा लेने को तत्पर रहा।
Download
Pages:24-27
How to cite this article:
महेन्द्र सिंह "धरना परम्परा के सिरमोर के रूप में आऊवा". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 11, Issue 1, 2025, Pages 24-27
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.