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VOL. 11, ISSUE 5 (2025)
दिल्ली सुल्तानों द्वारा यूनानी चिकित्सा प्रणाली का संरक्षण
Authors
जूही आर्या
Abstract
13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही मध्य एशिया और फारस से यूनानी चिकित्सा (तिब्ब-ए-यूनानी) भारत आई। दिल्ली के सुल्तानों ने इस ज्ञान प्रणाली को न केवल अपनाया, बल्कि इसके विकास के लिए एक मजबूत आधार भी तैयार किया। प्रारंभिक सुल्तानों, विशेषकर खिलजी वंश के शासकों ने, मंगोल आक्रमणों से भागकर आए विद्वानों और हकीमों को अपने दरबार में आश्रय देकर इसे प्रतिष्ठा प्रदान की। जियाउद्दीन बरनी जैसे इतिहासकारों ने अलाउद्दीन खिलजी के दौर को ज्ञान-विज्ञान के विशेषज्ञों का केंद्र बताया है, जहाँ प्रसिद्ध हकीमों को सम्मान प्राप्त था। इस संरक्षण का स्वर्ण युग तुगलक वंश के शासनकाल में आया। सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने दिल्ली में एक विशाल सार्वजनिक अस्पताल (दार-उश-शफ़ा) की स्थापना की, जैसा कि उनकी आत्मकथा श्फुतुहात-ए-फिरोजशाहीश् और शम्स-ए-सिराज अफीफ के वृत्तांतों में वर्णित है। यह अस्पताल सभी के लिए खुला था और इसका खर्च राज्य द्वारा वहन किया जाता था। यहाँ कुशल हकीमों द्वारा रोगियों को मुफ्त दवा, भोजन और देखभाल प्रदान की जाती थी, जो कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को दर्शाता है। बाद के सैय्यद और लोदी वंशों के दौरान राजनीतिक अस्थिरता के कारण शाही संरक्षण में कमी आई, लेकिन तब तक यूनानी चिकित्सा भारत में अपनी जड़ें जमा चुकी थी। हकीमों ने निजी तौर पर अपना काम जारी रखा और यह पद्धति प्रांतीय राज्यों में भी फैल गई। संक्षेप में, दिल्ली सुल्तानों ने चिकित्सकों को सम्मान देकर, सार्वजनिक चिकित्सालयों का निर्माण कर, और चिकित्सा शिक्षा को प्रोत्साहित करके यूनानी प्रणाली को संस्थागत रूप दिया। उनके संरक्षण ने यूनानी चिकित्सा को भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग बना दिया, जिसने भविष्य में, विशेषकर मुगल काल में, इसके और अधिक विकास की नींव रखी।
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Pages:144-146
How to cite this article:
जूही आर्या "दिल्ली सुल्तानों द्वारा यूनानी चिकित्सा प्रणाली का संरक्षण". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 11, Issue 5, 2025, Pages 144-146
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