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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
गोरखनाथ के दृष्टिकोण में मानव जीवन का ध्येय
Authors
ममता, डॉ॰ जगदीश भारद्वाज
Abstract
गोरखनाथ के दृष्टिकोण में मानव जीवन का ध्येय केवल सांसारिक उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि सत्य बोध और शिवत्व की प्राप्ति है। यह ध्येय गुरु कृपा से ही सिद्ध होता है। गुरु के उपदेश से साधक की अज्ञान-निष्ठा समाप्त हो जाती है और वह माया प्रपंच के अंधकार में पुनः प्रविष्ट नहीं होता। गोरखनाथ की दृष्टि यह स्पष्ट करती है कि देह केवल साधन है साध्य नहीं। नाथ साहित्य में सत्य-बोध की तुलना स्वर्ण प्राप्ति से कि गई है- सांच का सबद सोना का रेख। यह रूपक छान्दोग्य उपनिषद् के उस कथन से तादात्म्य रखता है जहाँ सत्य को सर्वश्रेष्ठ मूल्य कहा गया है- सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म। सदगुरु के सान्निध्य में प्राप्त सत्य-ज्ञान ही साधक को पिण्ड-सिद्धि से ब्रह्म सिद्धि की ओर ले जाता है। गोरखनाथ की दृष्टि से देखा जाए तो मानव जीवन न तो केवल सामाजिक कर्Ÿाव्यों तक सीमित है और न ही मात्र वैराग्य का आग्रह करता है अपितु वह सहज योग का मार्ग सुझाता है- यहाँ ग्रहस्थ जीवन में रहते हुए भी आत्मज्ञान संभव है। वे गुरु-कृपा, साधना, अनुशासन ओर अनुभव को शास्त्र से अधिक महत्व देते हैं। गोरखनाथ द्वारा चित्तवृत्तियों के निरोध द्वारा ही मानवजीवन का ध्येय सम्भव है। इस सन्दर्भ में उनका नाथ सम्प्रदाय योग की अवधारणा पतञ्जली के योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः से तात्विक साम्य रखता है। अपितु नाथ परम्परा में यह सिद्धान्त साधनात्मक और प्रयोगात्मक धरातल पर अधिक विकसित रूप में दिखाई देता है। इस प्रकार गोरखनाथ की दृष्टि में मानव जीवन का ध्येय है- अविद्या का नाश, ओर अन्धकार से प्रकाश की और अग्रसर होना ओर द्वैत से मुक्ति और स्वयं में निहित परम सत्य का साक्षात्कार। यही नाथ परस्परा का केन्द्रिय दर्शक है।

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Pages:223-226
How to cite this article:
ममता, डॉ॰ जगदीश भारद्वाज "गोरखनाथ के दृष्टिकोण में मानव जीवन का ध्येय". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 223-226
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