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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
गोरखनाथ के मत में हठयोग साधना संतुलन की प्रासंगिकता
Authors
ममता, जगदीश भारद्वाज
Abstract
हठयोग भारतीय योग परंपरा की एक प्राचीनतम, वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक साधना-पद्धति है, जिसका मूल उद्देश्य केवल शारीरिक स्वास्थ्य नहीं, अपितु मानसिक संतुलन, नैतिक अनुशासन, आत्मशुद्धि तथा आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति है। नाथ सिद्ध परंपरा में हठयोग को मनोकायिक साधना का आधार माना गया है, जिसके द्वारा साधक अपने शरीर को तपःसाधना का उपकरण बनाकर चित्त की चंचलता पर नियंत्रण प्राप्त करता है। गोरखनाथीय ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि शरीर को स्वस्थ, स्थिर एवं शुद्ध बनाए बिना उच्चतर योग- राजयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग की सिद्धि सम्भव नहीं। सिद्ध सिद्धांत पद्धति में योग को जीवन की पूर्णता का साधन माना गया है। हठयोग की उपादेयता केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक शांति, नैतिक उत्थान तथा विश्व कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करता है। नाथ परम्परा में वर्णित योगाभ्यास- जैसे आसन, प्राणायाम, मुद्रा और ध्यान मानव के अन्तःकरण को शुद्ध करते हैं और जीवन की असंतुलित प्रवृŸिायों (जैसे काम, क्रोध और लोभ) को नियन्त्रित करने में सहायक होते हैं। इस संतुलन के माध्यम से साधक आत्मानुभूति की ओर अग्रसर होता है।
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Pages:111-113
How to cite this article:
ममता, जगदीश भारद्वाज
"गोरखनाथ के मत में हठयोग साधना संतुलन की प्रासंगिकता". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 111-113
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