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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की राष्ट्रदृष्टि और विकसित भारत /2047 का विज़न (एक अवलोकन)
Authors
तपन कुमार शांडिल्य
Abstract
यह शोध-आलेख डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की राष्ट्रदृष्टि और भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘विकसित भारत /2047’ के बीच सार्थक समन्वय का विश्लेषण करता है। डॉ हेडगेवार, जिन्होंने 1925 में विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की थी, ने भारत को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से परे सांस्कृतिक पुनर्जागरण, सामाजिक समरसता और आर्थिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से सशक्त राष्ट्र के रूप में देखा। उनका मूल मंत्र था दृ “शक्ति संगठन से आती है।” उन्होंने अनुशासित कार्यकर्ताओं (कार्यकर्ता निर्माण), दैनिक शाखा प्रणाली (जो चरित्र-निर्माण की प्रयोगशाला थी), और हिंदुत्व (जिसे उन्होंने संकीर्ण धार्मिक अर्थ में न लेते हुए व्यापक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में परिभाषित किया) पर बल दिया। हेडगेवार जी ने जातिगत विभाजन, सामाजिक विषमताओं और आर्थिक परतंत्रता को भारत की पराधीनता का मूल कारण पहचाना। उनके अनुसार, स्वदेशी व्रत, कर्तव्यनिष्ठ नागरिकता और सामाजिक समरसता ही राष्ट्र के पुनर्निर्माण की आधारशिलाएँ हैं।
‘विकसित भारत /2047’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नीति आयोग द्वारा प्रस्तुत वह दूरदर्शी प्रारूप है जिसका लक्ष्य स्वतंत्रता की शताब्दी (2047) तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना है। आर्थिक लक्ष्यों में 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था और 18,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय प्राप्त करना शामिल है, जिसके लिए 7-10 प्रतिशत की निरंतर विकास दर आवश्यक है। सामाजिक स्तर पर 100 प्रतिशत साक्षरता, 70 प्रतिशत महिला श्रम भागीदारी (वर्तमान 37 प्रतिशत से), 100 प्रतिशत कुशल कार्यबल, वैश्विक लैंगिक समानता में शीर्ष 10 में स्थान, 84 वर्ष की औसत जीवन प्रत्याशा, और कार्बन उत्सर्जन में 55 प्रतिशत की कमी (2005 के स्तर से) जैसे उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं। 2047 तक भारत की कामकाजी आयु की जनसंख्या लगभग 112 करोड़ होगी, जो विश्व का सबसे बड़ा कार्यबल होगा।
यह लेख सिद्ध करता है कि हेडगेवार जी के मूल सिद्धांत दृ संगठन शक्ति, समरसता, स्वदेशी, युवा सशक्तिकरण और कर्तव्यबोध दृ विकसित भारत के प्रत्येक स्तंभ में गहरे समाए हुए हैं। नीति आयोग का ‘टीम इंडिया’ का दृष्टिकोण हेडगेवार जी के ‘संगठन में शक्ति’ का ही विस्तार है। ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’ और आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में प्रस्तावित ‘स्वदेशी 2.0’ हेडगेवार जी के स्वदेशी दर्शन के आधुनिक रूप हैं। सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और शून्य गरीबी के लक्ष्य उनकी ‘समरसता’ की परिकल्पना को साकार करने के प्रयास हैं। 112 करोड़ कार्यबल को कुशल बनाने का लक्ष्य उनके ‘कार्यकर्ता निर्माण’ मॉडल से प्रेरित है। निष्कर्षतः डॉ हेडगेवार की राष्ट्रदृष्टि कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जो विकसित भारत /2047 के निर्माण हेतु व्यावहारिक रूपरेखा प्रदान करती है। उनके शब्दों में दृ “संगठित हिंदू समाज ही भारत का पुनर्निर्माण कर सकता है” दृ यही विकसित भारत का मूल मंत्र है।

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Pages:295-299
How to cite this article:
तपन कुमार शांडिल्य "डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की राष्ट्रदृष्टि और विकसित भारत /2047 का विज़न (एक अवलोकन)". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 295-299
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