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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
कांट का कर्तव्यवाद और मानवाधिकार : एक दार्शनिक विश्लेषण
Authors
डॉ. नीतू कुमारी
Abstract
इमैनुएल कांट का कर्तव्यवाद आधुनिक नैतिक दर्शन की एक महत्वपूर्ण विचारधारा है, जिसका आधार यह सिद्धांत है कि किसी कर्म की नैतिकता उसके परिणामों पर नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित कर्तव्य, सद्भावना और नैतिक नियमों के पालन पर निर्भर करती है। कांट के अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपने आप में एक साध्य है, इसलिए उसकी गरिमा, स्वतंत्रता और स्वायत्तता का सम्मान करना नैतिक कर्तव्य है। यही सिद्धांत आधुनिक मानवाधिकारों की दार्शनिक आधारशिला के रूप में भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि मानवाधिकार प्रत्येक व्यक्ति की समानता, स्वतंत्रता, सम्मान और न्याय की रक्षा पर बल देते हैं। प्रस्तुत शोध-लेख में कांट के कर्तव्यवाद के मूल सिद्धांतों, विशेषतः श्रेणीबद्ध अनिवार्यता, नैतिक स्वायत्तता तथा मानव गरिमा की अवधारणा का विश्लेषण करते हुए मानवाधिकारों के साथ उसके अंतर्संबंधों का दार्शनिक अध्ययन किया गया है। साथ ही, समकालीन संदर्भ में मानवाधिकारों की चुनौतियों, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा वैश्विक नैतिक विमर्श के परिप्रेक्ष्य में कांट के विचारों की प्रासंगिकता और सीमाओं का भी आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि कांट का कर्तव्यवाद आज भी मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता, नैतिक उत्तरदायित्व और मानवीय गरिमा की स्थापना के लिए एक सुदृढ़ दार्शनिक आधार प्रदान करता है।
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Pages:195-196
How to cite this article:
डॉ. नीतू कुमारी "कांट का कर्तव्यवाद और मानवाधिकार : एक दार्शनिक विश्लेषण". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 195-196
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