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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
अकाल, राहत और सामाजिक पुनर्गठन: 20वीं सदी में मारवाड़ रियासत के जनजीवन में राज्य की भूमिका का ऐतिहासिक अध्ययन
Authors
डॉ. रीतू चौधरी
Abstract
मारवाड़ रियासत का सामाजिक और आर्थिक इतिहास उसके शुष्क भौगोलिक परिवेश तथा वर्षा-आधारित कृषि व्यवस्था से गहरे रूप में जुड़ा हुआ था। 20वीं सदी में अकाल केवल खाद्यान्न की कमी की प्राकृतिक घटना नहीं था, बल्कि उसने कृषि, पशुधन, रोजगार, ग्रामीण ऋण, प्रवास, सामाजिक संबंधों और राज्य-प्रजा संबंधों को भी प्रभावित किया। इस शोध का उद्देश्य 20वीं सदी में मारवाड़ रियासत में अकाल की परिस्थितियों, राज्य द्वारा अपनाए गए राहत उपायों तथा इन उपायों के परिणामस्वरूप उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का ऐतिहासिक अध्ययन करना है। अध्ययन में विशेष रूप से 1899–1900 के अकाल की पृष्ठभूमि, 1920 के दशक के अकाल तथा 1930–40 के दशक में उत्पन्न दीर्घकालिक सूखा-अकाल परिस्थितियों को व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में देखा गया है। 1899–1900 के अकाल में जोधपुर राज्य को राजपूताना के सबसे गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में गिना गया और फरवरी 1900 में एक लाख दस हजार से अधिक व्यक्ति अकाल राहत प्राप्त कर रहे थे।
महाराजा उमेद सिंह के काल में अकाल-राहत की प्रकृति में सार्वजनिक निर्माण तथा रोजगार-आधारित राहत का महत्व दिखाई देता है। उमेद भवन के निर्माण को भी 1920 के दशक की अकाल परिस्थितियों से जोड़कर देखा जाता है; उपलब्ध स्रोतों के अनुसार 1923 में जोधपुर अकाल से प्रभावित था और बाद में रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इस परियोजना को आरंभ किया गया। 1938–42 के दौर में अकाल और ग्रामीण असंतोष का संबंध और स्पष्ट हुआ। भारत सरकार के डिजिटल जिला अभिलेख के अनुसार पाँच वर्ष तक चले सूखे और उसके बाद उत्पन्न गंभीर अकाल ने मारवाड़ में राजनीतिक चेतना को भी प्रभावित किया तथा मारवाड़ लोक परिषद ने राहत की अपर्याप्तता, जागीरदारों के शोषण और ग्रामीण समस्याओं को राजनीतिक मुद्दों से जोड़ा। इस प्रकार अकाल-राहत को केवल तत्कालीन सहायता के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक क्षमता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक पुनर्गठन और राजनीतिक चेतना के विकास की प्रक्रिया के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है।
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Pages:274-278
How to cite this article:
डॉ. रीतू चौधरी "अकाल, राहत और सामाजिक पुनर्गठन: 20वीं सदी में मारवाड़ रियासत के जनजीवन में राज्य की भूमिका का ऐतिहासिक अध्ययन". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 274-278
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