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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 6, ISSUE 5 (2020)
महिला एवं पितृसत्तात्मक समाज
Authors
प्रतिमा सिंह
Abstract
पितृसत्ता एक सार्वभौमिक व सामाजिक सत्ता है। पितृसत्ता का मूलभूत अर्थ है ‘पिता का शासन‘ से है। पीटर लैसलेट ने अपनी पुस्तक ‘द वल्र्ड वी लास्ट‘ में औद्योगीकरण से पहले इंग्लैंड के समाज की परिवारिक व्यवस्था में पहली खासियत उसका पितृसत्तात्मक होना बताया था। भारत के संदर्भ में देखें तो इस तरह की परिवारिक व्यवस्था (संयुक्त परिवार) आजादी के बाद काफी सालों तक बनी रही। आज सभी समाजों में पितृसत्ता का अर्थ हो गया है-पुरुषों का शासन। पितृसत्ता को एक व्यवस्था के रूप में देखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कोई कानून या सरकार से स्थापित नहीं होती, यह स्थापित होती है सामाजिक मानदंडों से, परम्परा एवं रूढ़िवादियों से। पितृसत्तात्मक समाज एक ऐसा समाज है जहां महिलाओं व पुरुषों में अंतर स्थापित करते हुए पदसोपानात्मक व्यवस्था स्थापित हो जाती हो, जिसके तहत पुरुष सर्वश्रेष्ठ हो जाते हैं और महिला उनके अधीन।
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Pages:86-88
How to cite this article:
प्रतिमा सिंह "महिला एवं पितृसत्तात्मक समाज". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 6, Issue 5, 2020, Pages 86-88
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