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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
पर्यावरण प्रदूषण एवं मानवीय स्वास्थ्य-भारतीय संस्कृति के विशेष सन्दर्भ में
Authors
Dr. Rajesh Yadav
Abstract
सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव एवं पर्यावरण एक दूसरे से अन्तक्र्रिया करते रहे हैं। पर्यावरण मानव को प्रभावित करता है तथा मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए पर्यावरण में परिवर्तन करता है। इस प्रकार के परिवर्तन से ही मानव अपनी संस्कृति का विकास करता है। अतीत काल में कम जनसंख्या होने के कारण तथा मानव की सीमित महत्वाकांक्षा के कारण पर्यावरण को कोई नुकसान नही होता था। मानव की जनसंख्या में वृद्धि, तीव्र नगरीकरण, औद्योगीकरण, कृषि विकास, भौतिकवादी सोच, दिखावटीपन जीवन आदि के द्वारा मानव विकास के नाम पर पर्यावरण को असंतुलित करता जा रहा है। पर्यावरण इतना अधिक प्रदूषित हो गया है कि अब यह असंतुलित होने लगा है। पर्यावरण में बदलाव के द्वारा जहां मानव का कल्याण हुआ है, वहीं पर पर्यावरण प्रदूषण की गम्भीर समस्या का सामना भी करना पड़ रहा है। पर्यावरण प्रदूषण का प्रभाव केवल मानव पर ही नही अपितु जीव-जन्तुओं तथा वनस्पतियों पर भी पड़ा है। वर्तमान समय में जल, वायु, मृृदा के साथ ही हमारी संस्कृति भी प्रदूषित हो गई है। वर्तमान अध्ययन में पर्यावरण प्रदूषण तथा मानव स्वास्थ्य की भारतीय संस्कृति के विशेष सन्दर्भ में विश्लेषण किया गया है। इसके अन्तर्गत जल, वायु, ध्वनि, मृदा एवं सामाजिक प्रदूषण की विशद चर्चा की गई है। जल प्रदूषण के अन्तर्गत पाया गया है कि विभिन्न कारखानों, नगरों के गन्दे जल-मल, फसलों के लिए प्रयुक्त कीटनाशक आदि जल में घुलकर जल स्रोतों को प्रदूषित करने में अपनी अहम् भूमिका निभा रहे हैं। जल प्रदूषण के कारण मानव के स्वास्थ्य पर भी बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा है। इसके कारण मानव विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो गया है। वायु प्रदूषण के अध्ययन में पाया गया है कि खुली हवा में सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है तथा वायु प्रदूषण से मानव का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है। चिमनियों से निकलने वाले धुएं, पटाखे जलाने, मोटरवाहन, पम्पसेटों, निर्माणकार्यों, खेतों में पराली जलाने आदि द्वारा वायु प्रदूषित होती है। इस प्रदूषण से सबसे अधिक मानव के फेफड़े प्रभावित होते हैं। ध्वनि प्रदूषण के विश्लेषण में पाया गया है कि ध्वनि की एक निश्चित सीमा होती है, जो मानव के लिए आवश्यक है, परन्तु इस सीमा के अतिक्रमण होने पर यह मानव के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाती है। तीव्र ध्वनि से मानव की श्रवण शक्ति चली जाती है। गर्भवती महिलाओं में कभी-कभी गर्भपात तक हो जाता है। अधिक समय तक ध्वनि प्रदूषण के सम्पर्क में रहने के कारण लोगों में चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, मानसिक असंतुलन आदि बीमारियां भी हो जाती है। तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण उसके भरण पोषण के लिए फसलोत्पादन में वृद्धि करने के लिए मानव मृदा में विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों का प्रयोग कर रहा है, जिससे मृदा प्रदूषित हो रही है। प्रदूषित मृदा में उत्पन्न शाक-सब्जी, अनाज, फल आदि भी प्रदूषित हो जाते हैं। मानव तथा जीव-जन्तु अपनी क्षुधा को शांत करने के लिए इनका सेवन करते हैं जिससे इनका स्वास्थ्य भी खराब हो जाता है। मृदा प्रदूषण को नियंत्रित करना बहुत आवश्यक हो गया है अन्यथा की स्थिति में मानव का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। इस अध्ययन में सांस्कृतिक प्रदूषण का भी विश्लेषण किया गया है। भारत में एक कहावत कही जाती है ’जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन’ अर्थात् प्रदूषित अनाज एवं जल ग्रहण करने पर मानव का मस्तिष्क भी स्वस्थ नही होता है। अतीत में कम संसाधन थे, कम इच्छाएं थी, कम पैसे थे तो मानव में अधिक भाईचारा थी, अधिक स्नेह था, अधिक सहयोग करने की भावना थी, अधिक परोपकारी के साथ ही वह खुशहाल भी था। जैसे-जैसे मानव का विकास होता गया वह आर्थिक रूप से, तकनीकी रूप से सुदृढ होता गया, औद्योगिक विकास के साथ-साथ भौतिक विकास भी हुआ परन्तु मानव की संस्कृति विकृत होती गई। हमारी भारतीय संस्कृति एक सुदृढ़ संस्कृति रही है परन्तु अब यह भी सांस्कृतिक प्रदूषण का शिकार होती जा रही है। समाज में भारतीय संस्कृति का मानव के जीवन पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों को बताकर समाज में होने वाले सांस्कृतिक प्रदूषण को कम किया जा सकता है। प्रस्तुत अध्ययन द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है। इसमें आनुभविक विधि का प्रयोग किया गया है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि पर्यावरण प्रदूषण आधुनिक युग की एक गम्भीर समस्या है। इसका मानव के स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए मानव को दिखावे की संस्कृति को छोड़कर हमारी भारतीय संस्कृति जो कि हमारे पर्यावरण के लिए उचित है को अपनाकर हम लोग पर्यावरण प्रदूषण का न्यूनीकरण कर सकते हैं।
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Pages:34-38
How to cite this article:
Dr. Rajesh Yadav "पर्यावरण प्रदूषण एवं मानवीय स्वास्थ्य-भारतीय संस्कृति के विशेष सन्दर्भ में ". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 34-38
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