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VOL. 8, ISSUE 5 (2022)
प्राचीन भारत में न्यायिक प्रक्रिया
Authors
डॉ हितेश शर्मा
Abstract
प्राचीन भारत में न्यायिक प्रक्रिया एक सुव्यवस्थित, नैतिक और धर्म-आधारित प्रणाली पर आधारित थी, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में न्याय, संतुलन और व्यवस्था बनाए रखना था। इस व्यवस्था का आधार ‘धर्म’ था, जो न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और नैतिक आचरण का भी मार्गदर्शक सिद्धांत था। न्यायिक प्रणाली में राजा को सर्वाेच्च न्यायाधीश माना जाता था, किन्तु वह अकेले निर्णय नहीं लेता था, बल्कि विद्वानों, पुरोहितों और न्यायाधीशों (सभासदों) की सहायता से न्याय करता था।
प्राचीन ग्रंथों जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और अर्थशास्त्र में न्यायिक प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में कानून के स्रोत, साक्ष्य के प्रकार, दंड व्यवस्था और न्यायिक आचरण के नियम स्पष्ट रूप से निर्धारित किए गए थे। न्यायालयों को ‘सभा’ या ‘परिषद’ कहा जाता था, जहाँ मामलों की सुनवाई होती थी। साक्ष्य के रूप में गवाह, दस्तावेज और शपथ को महत्व दिया जाता था।
दंड व्यवस्था भी न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा थी, जिसमें अपराध की प्रकृति और गंभीरता के अनुसार दंड निर्धारित किया जाता था। दंड का उद्देश्य केवल दंडित करना नहीं, बल्कि सुधार और सामाजिक संतुलन बनाए रखना भी था। इस प्रकार, प्राचीन भारतीय न्यायिक प्रक्रिया नैतिकता, धर्म और सामाजिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों पर आधारित एक प्रभावी और संगठित प्रणाली थी, जिसने आधुनिक न्यायिक व्यवस्था की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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Pages:84-86
How to cite this article:
डॉ हितेश शर्मा
"प्राचीन भारत में न्यायिक प्रक्रिया". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 8, Issue 5, 2022, Pages 84-86
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