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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 9, ISSUE 1 (2023)
पंचायती राज-व्यवस्थाओं में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता (जनपद हरिद्वार के संदर्भ में)
Authors
वंदना सैनी
Abstract
राजनीतिक सहभागिता को लोकतन्त्र का आधार माना जाता है। राजनीतिक व्यवस्थाओं की लोकतान्त्रिकता का नाम ही राजनीतिक सहभागिता है। लोकतंत्र में जितनी सहभागिता अधिक होगी उतना ही उसे वास्तविक और सफल माना जायेगा। लोकतन्त्र में ‘जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए’ सरकार यथार्थ में तब ही स्थापित हो सकती है, जब लोगों की अधिक से अधिक राजनीतिक सहभागिता हो। लोकतन्त्र में व्यापक मताधिकार के माध्यम से आम आदमी शासनतन्त्र में सहभागी बन जाता है। उसके सहभागी बनने का यह विधिक प्रावधान ही व्यक्ति को राजनीतिक कृत्य के लिए आगे लाता है। अतः लोकतान्त्रिक व्यवस्था की कार्यात्मकता का आधार राजनीतिक व्यवस्था में जन-सहभागिता ही मानी जाती है। लोकतन्त्र की सफलता या असफलता का अंकन राजनीतिक सहभागिता की मात्रा के आधार पर किया जाता रहा है। राजनीतिक विरक्तता या उदासीनता को लोकतन्त्र के लिए खतरा माना जाता है। इस सबसे स्वतः ही यह निष्कर्ष निकलने लगता है कि लोकतन्त्र की श्रेष्ठता के लिए राजनीतिक सहभागिता का आधिक्त अनिवार्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति का राजनीति में भागीदारी का स्तर अलग-अलग होता है। किसी भी व्यक्ति की राजनीतिक अभिरूचि उसकी स्थिति-परिस्थितियों पर निर्भर करती है। सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारक मिलकर राजनीतिक वातावरण तैयार करते हैं। व्यक्तिगत रूप से राजनीतिक सहभागिता व्यक्ति की मनोवृत्ति और उसकी परिस्थितियों पर निर्भर करती है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व में सहभागिता के जितने भी लक्षण पाये जायेंगे, वह उसके उतने ही आधुनिक होने का प्रमाण है। एक धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक समाज अपने प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा करता है कि वह सरकार के संचालन में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करें। बिना किसी भय और हस्तक्षेप के राजनीतिक सहभागिता, उच्च राजनीतिक विकास का संकेतक है।
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Pages:13-15
How to cite this article:
वंदना सैनी "पंचायती राज-व्यवस्थाओं में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता (जनपद हरिद्वार के संदर्भ में)". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 9, Issue 1, 2023, Pages 13-15
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