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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 11, ISSUE 5 (2025)
लौद्रवा जैन मंदिर, जैसलमेर : एक ऐतिहासिक एवं स्थापत्य अध्ययन
Authors
संगीता चौधरी
Abstract

राजस्थान की स्वर्णिम मरुभूमि केवल प्राकृतिक सौंदर्य और वीरता की गाथाओं के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र अपनी अद्भुत स्थापत्य परंपराओं और धार्मिक धरोहरों के लिए भी वैश्विक स्तर पर पहचाना जाता है। यहाँ की हवेलियाँ, दुर्ग, मंदिर और शिल्पकृतियाँ मानव रचनाशीलता और आस्था के अनूठे उदाहरण हैं। इन्हीं धरोहरों में लौद्रवा जैन मंदिर एक विशिष्ट स्थान रखता है।जैसलमेर नगर से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। लौद्रवा कभी जैसलमेर क्षेत्र की राजधानी रहा, और इसी कारण यह नगर सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र था। लौद्रवा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य लौद्रवा का प्राचीन नाम लोध्रवास था। यह नगर 8वीं से 12वीं शताब्दी तक जैसलमेर की राजधानी रहा। उस समय लौद्रवा व्यापार मार्गों से जुड़ा होने के कारण समृद्ध नगर था। यहाँ अनेक मंदिर, बावड़ियाँ और कलात्मक स्मारक बनाए गए।इतिहासकारों का मानना है कि 10वीं शताब्दी तक यह नगर अत्यंत समृद्ध था। किंतु अरब आक्रमणों और स्थानीय संघर्षों ने इसकी सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट कर दिया। अनेक भव्य मंदिर ध्वस्त हुए, किंतु धार्मिक आस्था और शिल्प परंपरा ने इसे बार-बार पुनर्जीवित किया।लौद्रवा जैन मंदिर का पुनर्निर्माण विभिन्न कालखंडों में हुआ और आज यह राजस्थान की कला और जैन आस्था का अद्भुत संगम बन चुका है।स्थापत्य और शिल्पकला लौद्रवा जैन मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।गर्भगृह में भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा स्थापित है। मंडप के स्तंभों पर बारीक नक्काशी की गई है, जिसमें पुष्प, बेल-बूटे, मानवाकृतियाँ और पौराणिक दृश्य अंकित हैं।मंदिर का तोरणद्वार अपनी कलात्मकता और भव्यता के लिए अद्वितीय माना जाता है।मंदिर के शिखर राजस्थान की जैन मंदिर वास्तुकला की उच्चता को दर्शाते हैं।

संगमरमर और बलुआ पत्थर पर की गई मूर्तियाँ राजस्थान की शिल्प परंपरा की पराकाष्ठा को दिखाती हैं।यहाँ की जालियों से छनकर आने वाली रोशनी और वायु स्थापत्य के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचायक है, जो यह सिद्ध करता है कि शिल्पकार केवल कला ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और तकनीक की गहरी समझ रखते थे।स्थापत्य शैली की विशेषताएँलौद्रवा जैन मंदिर में मारू-गुर्जर शैली की स्पष्ट झलक मिलती है।शिखर, गुम्बद और झरोखे राजस्थान की विशिष्ट स्थापत्य पहचान को प्रस्तुत करते हैं।मंदिर की संरचना में स्थानीय मरुस्थलीय परिस्थितियों के अनुसार वास्तुकला को ढाला गया है।तोरण और झरोखे स्थानीय परंपरा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।इस शैली में सादगी और भव्यता दोनों का अद्भुत संयोजन दिखाई देता है। धार्मिक महत्व

यह मंदिर जैन धर्म के अनुयायियों के लिए केवल एक उपासना स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था का केंद्र है।

प्रतिवर्ष यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए आते हैं।पार्श्वनाथ जयंती और वार्षिक मेले का आयोजन यहाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है।जैन धर्म के सिद्धांत – अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह – इस मंदिर की वातावरण में अनुभव किए जा सकते हैं।लौद्रवा जैन मंदिर स्थानीय समाज के लिए सांस्कृतिक पहचान का केंद्र भी है।  इस शोधपत्र में लौद्रवा जैन मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, स्थापत्य शैली, शिल्पकला, धार्मिक महत्व और राजस्थान की कला परंपरा में इसकी भूमिका का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
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Pages:12-15
How to cite this article:
संगीता चौधरी "लौद्रवा जैन मंदिर, जैसलमेर : एक ऐतिहासिक एवं स्थापत्य अध्ययन". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 11, Issue 5, 2025, Pages 12-15
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