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VOL. 11, ISSUE 6 (2025)
बौद्ध साहित्य के आलोक में उत्तरापथ एवं दक्षिणापथ: प्राचीन भारतीय वाणिज्य और संस्कृति के वाहक
Authors
डॉ. अतुल नारायण सिंह, प्रदीप कुमार
Abstract
यह शोध पत्र प्राचीन भारत के 'द्वितीय नगरीकरण' काल की दो प्रमुख व्यापारिक धमनियों—उत्तरापथ और दक्षिणापथ—की विवेचना करता है । यह तर्क प्रस्तुत करता है कि पालि त्रिपिटक और जातक कथाओं जैसे बौद्ध साहित्य, इन मार्गों के अध्ययन के लिए प्रमुख प्राथमिक स्रोत हैं, क्योंकि वे ब्राह्मणवादी साहित्य के विपरीत, एक नए शहरी व्यापारी वर्ग ('सेट्ठी' और 'सार्थवाह') के दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। उत्तरापथ को मध्य एशिया (तक्षशिला) से गंगा घाटी होते हुए बंगाल के ताम्रलिप्ति बंदरगाह तक विस्तृत एक महामार्ग के रूप में वर्णित किया गया है। श्रावस्ती , तीन मार्गों के जंक्शन पर स्थित होने के कारण, एक प्रमुख आर्थिक-धार्मिक केंद्र बना, जहाँ बुद्ध ने अपने जीवन के अंतिम 25 'वर्षावास' व्यतीत किए । दक्षिणापथ, श्रावस्ती/वाराणसी से उज्जयिनी होते हुए दक्कन में प्रतिष्ठान तक जाता था, और पश्चिमी तट के बंदरगाहों (जैसे भरुकच्छ) के माध्यम से रोमन व्यापार को जोड़ता था। कौशाम्बी इन दोनों मार्गों के महा-संगम के रूप में महत्वपूर्ण था। जातक कथाएँ इन मार्गों पर व्यापारिक जीवन का सजीव चित्रण करती हैं, जिनमें कारवां के जोखिम (जैसे वण्णुपथ जातक) और 'सुवर्णभूमि' व 'बावेरु' (बेबीलोन) तक की समुद्री यात्राओं का उल्लेख है। पत्र का मुख्य तर्क बौद्ध संघ और व्यापार के बीच एक 'सहजीवी संबंध' को उजागर करना है। 'विनय पिटक' का 'वर्षावास' (मानसून प्रवास) का नियम भिक्षुओं को स्थायी 'विहारों' में रहने के लिए बाध्य करता था। इन विहारों को आर्थिक पोषण के लिए रणनीतिक रूप से व्यापार मार्गों पर स्थापित किया गया। दक्षिणापथ पर अजंता और कार्ले जैसी गुफाएँ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जो व्यापारियों के लिए सुरक्षित सराय का भी कार्य करती थीं। 'मिलिन्दपञ्ह' इस नेटवर्क का वैश्विक विस्तार 'अलसंद' (अलेक्जेंड्रिया) और चीन तक दिखाता है । अंततः, व्यापार ने संघ को वित्तीय संरक्षण दिया, और संघ ने व्यापार को बुनियादी ढाँचा और वैचारिक वैधता प्रदान की।
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Pages:22-25
How to cite this article:
डॉ. अतुल नारायण सिंह, प्रदीप कुमार "बौद्ध साहित्य के आलोक में उत्तरापथ एवं दक्षिणापथ: प्राचीन भारतीय वाणिज्य और संस्कृति के वाहक". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 11, Issue 6, 2025, Pages 22-25
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