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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
नागपुरी के वाद्य, गीत तथा ताल
Authors
डॉ. रामजय नाईक
Abstract
बिन पायल के बिना पाँव अच्छे नहीं लगते, बिन जोत के दीया प्रकाशित नहीं होती। उसी प्रकार बिना ताल के पाँव थिरकते नहीं। बिना वाद्य के ताल सुनाई नहीं पड़ते। गीत-संगीत के साथी है वाद्य। दोनों के मिलन से निकली आवाज सुनते ही लोग थिरक उठते हैं। वे अपने-आप को रोक नहीं पाते और अन्त में नाच उठते हैं। जिसकी आवाज पूरे ब्राहमांड को जगा देती है वही संगीत है। संगीत में जादू है उसका तो कहना ही नहीं है। संगीत के साथ वाद्य का जन्म-जात धनिष्ठ संबंध है। जन्म से हीये दोनों जुडुवे हैं। जहाँ भी, कभी भी, और कहीं भीये जाते हैं तो दोनों साथ में मिलकर।एक दूसरे के बिना जीवन जीने कीये कल्पना नहीं कर सकता है। डॉ. गिरीधारी राम गौंझू लिखते हैं कि-”वाणी का श्रृंगार है संगीत और संगीत का सौंदर्य है नृत्य,एवं गायन-वादन का आभूषण है वाद्य। संगीत जीवन का अक्षय वरदान है जो गम को कम तथा खुशी को सौ गुणा बढ़ा देता है। झारखण्डी कहावत में चलना ही नृत्य है बोलना ही संगीत है और वक्ष वा नितम्ब ही माँदर है।एक दूसरी लोकोक्ति भी है जिसे संगीत से प्रीत नहीं उसकी वाणी का कोई विश्वास नहीं। गायन वादनएवं नर्तन के बिना झारखण्डी जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
झारखण्ड घने और भयंकर जंगलों का नाम है जहाँ भयानक जानवरों से सुरक्षा के लिए तीव्र ध्वनि उत्पादकयंत्र बनाए गए। इन तीव्र ध्वनि निष्पादन वालेयंत्रों की ध्वनि सेये खूँखार पशु गाँवों की ओर प्रवेश करने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। क्योंकि जंगलों से घिरे खेत खलिहान, इनसे घिरे गाँव-घर और इनसे घिरा अखरा होता है। सांस्कृतिक केन्द्र अखरा गाँवों की हृदयस्थली है। अखरा से गूंजते वाद्य कानों में मधु घोलते प्रतीत होते हैं।“
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Pages:58-59
How to cite this article:
डॉ. रामजय नाईक "नागपुरी के वाद्य, गीत तथा ताल". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 58-59
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